Monday, September 27, 2010

दीनदयाल शर्मा की राजस्थानी किताब "बालपणे री बातां" से साभार

15 अगस्त 2009 ......बार थावर। अजादी री तरेसठवीं जयन्ती....... मानसी बैठक में टी.वी.देखैई...........। जदी बीं'री मम्मी बीं'नै हेलौ मार्यौ, 'मानसी.....के करै अै?'
'टी.वी.देखंू।'
'तो आज सारै दिन ईं' टी.वी.रै'ई चिप्पी रै'सी के......... ईंयां तो कोनी........ कै मम्मी नै काम रौ थोड़ौ सा'रौ लगा द्यंू। आगै के जवाब द्यांगा........ जद कै'सी कै छोरी नै तो कीं' काम कोनी सिखायौ ...........छोरी...........सुणै कोनी कै?'
'मम्मी, कम सूं कम आज तो नां कै' कीं'।'
'क्यूं ......आज कीं' स्पेशल है के ?........तन्नै सुण्यौ कोनी के.........थोड़ा बरतन मांज ले छोरी।'
'हे भगवान............अंगरेजां री गुलामी सूं तो पीछौ छूट ग्यौ.........पण घर में केठा कद अजादी मिलसी.........!' मानसी कै'यो
जदी बीं'री मम्मी बैठक में स्पीट सूं गई अर जा'र टी.वी.बंद करता थकां बोली, 'फालतू बातां तो रै'ण दे........अर थोड़ो काम रौ सा'रौ लगा देकर कदी......। चाल खड़ी हो.....।'
'कोनी होऊं नीं।'
'सुणैक.....कोनी....!'
'क्यूं ......भैयै नै तो थूं कीं कै'वै कोनी......अर मन्नै सारै दिन लड़ती रै'वै.....।'
जदी म्हूँ कंप्यूटर आळै कमरै में काम करतौ-करतौ बोल्यौ, 'अरै सुणै नीं.....मानसी नै टी.वी.देख लेण दे........।'
'थे'ई तो बिगाड़ौ.....सिर पर चढाल्यौ आ'नै........।
'कोई बात नीं टाबर है.....।' पछै म्हूँ मानसी नै कै'यौ कै बेटा.......तन्नै तेरी मेरी रौ कै'णौ मानणौ चइजै.... थूं इत्ती स्याणी है........अर इत्ती बड्डी होयगी......घर रौ काम भी तो सीखणौ चइजै...।'
'पापा, इत्ती बड्डी कठै होयगी......ईं बा'रा अगस्त नै दस साल री तो होई हूँ ......!'
मानसी नै म्हूँ प्यार सूं समझांवतां थकां कै'यौ, 'फेर भी बेटा.....थूं ईंयां नां बोलै कर......तेरी मम्मी नै काम सूं ना नटै कर.....।'
'पण पापा, मम्मी नै भी तो सोचणौ चइजै कै आज पंद्रा अगस्त है.......। आज रै दिन लोग कित्ती खुसी मनावै.....अर मम्मी मन्नै लड़ै......।'
म्हूँ बोल्यौ, 'लड़ै कोनी.....मा रौ फर्ज होवै.....उलाद नै समझाण रौ......। क्यूं कै मा हनीं.....टाबर री पै'ली गुरु होवै....।'
'औ'तो मन्नै पतौ है.....।'
'चंगा तो फेर.....अबै तेरी मम्मी नै काम रौ थोड़ौ सा'रौ लगा दे........बिच्यारी दिनगै री अेकली ई लाग री है........।'
'लगाऊं........।' कैं'वतां थकां मानसी रसोई कानी चाल पड़ी.......।
पछै मानसी री बात मेरै कानां में गूँजती रै'ई कै आ' साची कै'वै........छोरै अर छोरी में भेद खतम होण री पै'ल कद होसी....? औ' सुवाल आज भी खड़्यौ है अेक मिनख री अडीक में......।

हिंदी और राजस्थानी के वरिष्ठ बाल साहित्यकार मेरे पापा श्री दीनदयाल शर्मा की राजस्थानी किताब "बालपणे री बातां" से साभार...

4 comments:

  1. अरे वाह!
    यह पोस्ट तो बहुत उपयोगी है!
    --
    इसकी चर्चा तो बाल चर्चा मंच पर भी है!
    http://mayankkhatima.blogspot.com/2010/10/20.html
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    शब्द पुष्टिकरण हटा दीजिए!
    कमेंट करने में उलझन होती है!

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